तू कहीं खो गया

This is what, a thought of a daughter, about her father.

Written on request of one of my friend, who lost her dad recently.

May her dad, rest in peace.

चल पड़ती थी हर डगर पे
उबड खाबड़ रास्तों पे
इसी विश्वास में कि
थामी है मैने उंगली तेरी
गिरने लगूंगी जब भी
लड़खड़ा कर
सम्हाल लेगा बड़ा कर
बाहे तेरी

मेरी चुलबुली हंसी,
सुनना तुम्हे भाता बहुत था
तेरी गोद में उछल कर
आना एक सुकून था
मेरे माथे को, चूम कर
जब भी तूने दुलारा
मेरे विश्वास को हर बार
मिलता जुनून था

स्कूल छोड़ने जब भी
तू था मुझे जाता
तुझे बाय कहने में
आता संकोच था
लेकिन, छुट्टी की घंटी
जब भी थी बजती
दौड़ती सरपट तुझ टक
बताना सारा चिठ्ठा जरूरी था

तेरे हाथो का,
अपने सिर पे फेरना
मां से छुपा कर, कुछ पैसे बटोरना
तेरा मुझको गिरने से बचाते हुए
स्कूटर सीखना
मेरी चोट पे, तेरा नाम आंखो से
मलहम लगाना

नम आंखे तेरी
अब भी याद है मुझको
जब आया रिश्ता पहला
मेरे वास्ते
याद है, बही वो
गंगा जमुना तेरी आंखो से
जब तुझे लगा विदा करना जरूरी था
ससुराल, में सब मिला
पर फिर भी, जाने क्यों
कहीं कुछ, गुम सा
हरवक्त लगता था

पर, धीरे धीरे सब धीमा होगया
मैं अपनी जिंदगी में रम गई
तू कहीं गुम हो गया
पर, कभी देर सवेर याद आती थी
जब भी मैं, उस कोने वाली दुकान से
जलेबी खाती थी
वो आज भी, पूछते है
बेटा, एक जलेबी और लेलो,
पर, तेरी तश्तरी से चुरा कर
खाने में जो गुरूर था
वो गुरूर, कहीं रह गया
तेरी यादें ही बची है अब
तू कहीं खो गया
तू कहीं खो गया

देव

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