तेरे दीदार के बिना, रुखसत, तेरे शहर को किया।।

तुझसे मिलना, एक मुलाक़ात नहीं, सपना बन गया।
वक़्त,जाने कब, हाथो से फिसल गया।।

कुछ और पलो की आस में, दिन और रुक गया।
तेरे इंतज़ार में, रातों को मैं जगा।।

तेरे ना आने की खबर ने, बैचेन यूं किया।
तेरी झलक के खातिर, तेरे दर का रुख किया।।

झरोखे पे तेरे, टकटकी लगा बैठे रहे।
पता ना चला, दिन कब गुज़र गया।।

मजबूर हूं, चलना है आगे मुझे,
तेरे दीदार के बिना, रुखसत, तेरे शहर को किया।।

देव

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