बचपन भी, पाबंद ही गया है।

तुम्हे याद है, वो गुजरे हुए दिन,
सर्दी के दिन, खिलती हुई धूप,
मां का आंगन में बैठ, तिल कूटना,
गुड का अंगीठी पर चढ़ाना,
और तिल के लड्डू बनाना,

हफ्तों पहले, शुरू हो जाता था,
बेसब्र इंतेज़ार, संक्रांत का,
अरे वाह, तिल के लड्डू खाएंगे,
और लेंगे मजा, पतंगबाजी का,

बाज़ार से सूत का लेना,
पुरानी ट्यूब लाइट से पिसा कांच बनाना,
लड्डू से बचे गोंद का गलाना,
गली में फैला सूत को,
हाथो से मांजा बनाना,
मेरा मांजा, सबसे अच्छा हो,
इसी ख्वाहिश में, नई तिकड़म लगाना,
और भारी धूप में, सर्दी की फिक्र छोड़,
छत पर चढ, पतंगों से पेच लड़ना,
वो काटा, वो मारा, की आवाजे सुनना, सुनाना,
अरे ध्यान से, गिर नहीं जाना,
नीचे से मम्मी का चिल्लाना,
छोटे बच्चो का फायदा उठाना,
पतंग उड़ाने के लालच में,
कभी पापा, कभी भैया,
कभी पड़ोसी की, चखरी पकड़,
पूरा दिन, मांजा बटोरना,

बस, अब कहा, बड़ी बड़ी मंजिलों,
की भीड़ में, खो गए है,
जाने कब वो दिन, बड़े शहरों की,
आगे बढ़ने की, जिद में खो गए है,

अब तो ये जुनून भी, मजाक
हो गया है,
और डर इतना है, कि बचपन भी,
पाबंद ही गया है।।

देव

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