कुछ पुराने यारो से, मिला जाए।।

बिखरे पड़े किस्सों को, समेटा जाए,
कुछ पुराने यारो से, मिला जाए।

उसी शहर की तंग गलियों में,
जहां कभी खेले थे कंचे,
लगाई थी दौड़ साइकिल्स की,
कभी गिरते, कभी पड़ते
घावों पर मिट्टी मलते,
चल एक राउंड और हो जाए,
हवा से फिर सरपट बाते करते,
कुछ वक़्त फिर गुजारा जाए,
कुछ पुराने यारो से, मिला जाए।

कुछ अब भी यही है,
कुछ बसे है कहीं बाहर,
मगर अब भी नहीं लगता,
कभी अनजान ये शहर,
एक घर हो तो कहूं,
हर घर में, एक परिवार बना था,
यार से ज्यादा, मुझे प्यार मिला था,
अब दोस्त बाहर है, तो क्या,
अंकल आंटी, दादा दादी से मिला जाए
कुछ पुराने यारो से, मिला जाए।।

ना जाने, कैसे ये हो जाता था,
जहां बनता था कुछ खास,
मैं वहां पहुंच जाता था,
हलवा, खीर, पराठों का,
लुत्फ लिया जाता था,
दाल चावल पटाटा और पापड़ में,
मस्त स्वाद आता था,
चलो, आज फिर, वहीं स्नेह से भरा,
खाना खाया जाए,
कुछ पुराने यारो से, मिला जाए।।

कभी कॉलेज, कभी ऑफिस,
के गलियारों में, उमड़ते जज्बात, कागज़ के फर्रो में, जाहिर करते दिल की बात,
उसी गली के चक्कर काटना, दिन में चार,
जब भी दिख जाती थी वो,
मुस्कुरा कर पूछना, कैसी है यार,
चलो, आज फिर से, वही दौर दोहराया जाए,
कुछ पुराने यारो से, मिला जाए।।

देव

15 july 2020

Leave a Reply