बेखबर हो, महफिल की, चकाचौंध से
छुप छुप कर तुमको, देखा किए हम।
तेरे कांधे से, गिर कर, घिसटता ये पल्लू को,
थाम हाथो में अपने, चलते रहे हम।
बेखबर थी तू, और तेरे प्याले को,
छिपा जमाने कि नज़रों से, पीते गए हम।
तेरे किस्से, तेरी कहानियों, मगन हो खुद में,
तू कहती रही, सब्र से सुनते रहे हम।
थाम हाथो में, हाथ तेरा, ले सैलाब आंखो में,
दर्द दिल का किसी दिन कहते रहे हम।
मगर कैसे कहें, मोहब्बत है तुझसे,
कई मर्तबा, सोचा किए हम,
बस, यूं ही, तेरे इंतेज़ार में, तन्हा रह गए हम।।
देव
19/09/2020, 2:56 pm