घर को घर बनाती है,तुममें, मैं खुद को पाती हूं,

मैं, जो कभी मुझ पर इतराती थी,
अब, तुम पर इठलाती हूं,
तुम जो आई, जिन्दगी में मेरी,
गर्व खुद पर, और ज्यादा कर पाती हूं,

यूं तो तुममें, मैं खुद को पाती हूं,
मगर, तुममें तुम भी हो,
खुद से ज्यादा खूबसूरत तुम्हे पाती हूं,
तुम हो, तभी तो, मैं, मैं कहलाती हूं,
गर्व खुद पर और ज्यादा कर पाती हूं।

कहीं खो गई थी मेरी पहचान,
समाज के इन कायदों में,
नाम तक, ना मेरा, मेरा रहा,
कुछ छीना, कुछ जबरदस्ती दिया,
खोया जहां मेरा, मैं भी कहीं,
खो गई थी, तुम जब आईं,
मेरे चेहरे पर, फिर से वही खुशी थी।
मां होने का मान, कुछ ज्यादा कर पाती हूं।
गर्व खुद पर और ज्यादा कर पाती हूं।

तुम जो आई, बहुत बदलाव से,
मेरी जिन्दगी में आए थे,
स्वछंद सा घूमने वाले पर,
जिमीदारियों के बादल छाए थे,
एक अनंत सी खुशी,
चेहरे पर मेरे छलकती थी,
पिता की आवाजे, जो कभी
सुनाई नहीं देती थी, अब
कानो में मेरे बजती थी,

तुम आईं, तो एक नया,
संसार मेरा हो गया,
सुबह तुमसे शुरू, शाम का,
हर पल तुम्हारा हो गया,
पल में उतरती, दिन भर की अब है थकान,
एक बार, देखता हु तेरे चेहरे की जब मुस्कान,
तुम हो तब ही तो मैं, मैं बन पाया,
तुम्हारे आने से ही, वास्तव में,
मैं हूं पिता कहलाया।

सच है, बेटियां ही तो, वास्तव में,
घर को घर बनाती है,
कभी बेटी, कभी बहू बन कर,
है घर को सजाती है।।

देव

28/09/2020, 9:17 am

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