जो भाला तुम्हे धोखे से लगा,
वो भाला नहीं में पाई रोक,
पर प्रण था मैंने भी लिया,
जख्म दूंगी हजारों उन्हें,
चाहे ले कोई रोक।
थोड़ी लज्जा थी, प्रति उनके,
जख्मों ने तेरे ले डाली,
कर दी प्रचण्ड अग्नि मुझमें,
जब चोट तुम्हे थी दे डाली।
एक के बाद एक, प्रहार किया,
उनका जीना दुश्वार किया,
जिसे स्त्री समझ कर बैठे थे,
उसने रण में, हाहाकार किया।
कर हाथ जोड़, घुटनों के बल,
चलवा कर उनको में आईं,
पछतावा है, गलती पर अपने,
क्यूं भाला मुझपर, नहीं चलाई।
बेटी थी, पर जाती थी,
क्या है इज्जत, पहचानती थी,
बन रण चंडी, प्रहार किया,
तेरा सिर ना, झुकने मैंने दिया।
अब वक़्त बड़ा, है गुजर गया,
अवशेष है याद में, तू कब का गया,
अब याद वो किस्से करती हूं,
अक्सर अपनो से, सुनती हूं।।
देव
26/10/2020, 7:16 pm