मैं पुरुष हूंँ !

तुम क्या समझोगे मुझे,
तुमने तो वही देखा है,
जो मैंने दिखाया है,
क्या कभी, मेरे अंतर्मन
में उबलते, ज्वालामुखी
का अंदेशा लगाया है।

मैं पुरुष हूंँ हाँ सही कहा,
जकड़ रखा है मुझे भी,
तो बंदिशों में, बचपन से,
मर्द को दर्द नहीं होता,
यहीं सिखाया है, और
जो झलकना चाहते थे
मेरे आंसू, उन पर,
मर्दानगी के नाम का,
अंकुश लगाया है।

कभी कोशिश भी,
करी होती मेरी सच्चाई को,
दिखावा मानने की,
कभी तो चुप चाप,
मेरे अंदर झांका होता,
कभी मेरे आक्रोश के,
पीछे छिपे आवेग को,
भावनाओं से नापा होता।

हर किसी ने मुझे,
किसी और की,
कठपुतली का नाम दिया,
और मेरे नाम को,
अपने नाम से जोड़,
अहसान जता दिया,
हर किसी ने, जताया,
बस है हक़ मुझ पर,
कभी बेटा, कभी पापा,
कभी स्वामी बना,
मुझसे मुझे छीना गया।

और मैं हूंँ, बस
चलता रहा, चलता गया,
जख्म ले, अपनो के,
दबा आंसू अपने, हंसता रहा।।

देव

27/12/2020, 10:49 am

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