उसके जेहन में, कौंधते सवालों का,
जवाब ढूंढने की कोशिश में,
मैं अपने सवालों को, जरा
भूलने लगा था, वो मुझको,
अनदेखा कर, बढ़ रही थी,
मैं उसकी राहों के काटें,
बुन रहा था। उसके ख्वाबों
को सच्चाई बना, परोसने
की ललक में, ना जाने
कितनी हकीकते मेरी,
मुझसे छूट रही थी,
और वो लिए चेहरे पर,
वही मुस्कुराहट, ना जाने,
इस भीड़ में किसे,
खोज रही थी। बेशक,
कुछ भटकी वो है तो सफर
मेरा भी तो सीधा नही है,
जिन्दगी है, ये कुछ तो
खेल, खेल रही थी।
देव 28/02/2021, 11:19 pm