जहां बचपन गुजारे जमाना हुआ

कल फिर उन्ही गलियों में जाना हुआ
जहां बचपन गुजारे जमाना हुआ
वहीं घर वहीं कमरे वहीं गालियां
जमाना बीत गया, पर कुछ ना बदला

दीवारों पर अब भी वही शैतानियां दिखी
बहनों के जोर से चिल्लाने की आवाजें सुनी
वहीं ट्रेन की आवाज अब भी सुनाई देती है
चाचाजी के आने की आवाज,
आज भी धड़कने बड़ा देती है

फिर निकला उन्हीं गलियों से होकर
जहां घूमता था साइकिल किराए की लेकर
वहीं बरगद का पेड़ आज भी खड़ा था
छत की मुंडेर से किला, आज भी दिखता था

चाची के हाथ की चाय, आज भी भाती है
सुबह पांच बजे, अरे! उठ जाओ
पानी आ गया है, नहा लो जल्दी जल्दी
चाचाजी की आवाज आज भी आती है

आज भी हमे वहीं आलस सुलाए रखता है
थोड़ी देर और सो लो, पापा थोड़ी देर में आयेंगे
बहन का आज भी यही मशवरा होता है

बस, अब वो बहने दिखाई नहीं देती
बड़े हो गए बच्चे सबके,
उनमें वो शैतानियां का हुनर नहीं होता
कहीं गुम हो गया, बचपन उनका
उन्हें हमारी बातों में यकीन नहीं होता

देव

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