तुझ बिन सूनी, गोकुल की गलियां,क्या मैं बताऊं, तुझको कन्हैया,यूं तो मन में, सूरत है तेरी,पर नजरो को, प्यास है तेरी,तू ही बता, समझाऊं कैसे,श्यामा, तुझ बिन मै, रह पाऊं, कैसे,श्यामा, तुझ बिन मैं, रह पाऊं, कैसे। आंगन में, भरा मक्खन, का घड़ा है,यमुना तट, वट वृक्ष खड़ा है,गगरी गोपियां, लेकर खड़ी है,ग्वालों की वो, … Continue reading श्यामा, तुझ बिन मै, रह पाऊं, कैसे
Month: May 2020
कान्हा, तुम छोड़ चले, क्यूं ब्रज को
कान्हा, तुम छोड़ चले, क्यूं ब्रज को,कान्हा, तुम छोड़ चले, क्यूं ब्रज को, तर तर अश्रु, धारा बहती, -२क्या जतन करे, रोकन को, कान्हा, तुम….. बांसुरी तेरी, जीवन है सबका -२कैसे सांस रहेगी, अब तन को, कान्हा, तुम… गोपियां, गैया, गोकुल की गलियां, -२कोई नहीं अब, यमुना तीरण को, कान्हा, तुम… राधा संग क्यूं, प्रेम … Continue reading कान्हा, तुम छोड़ चले, क्यूं ब्रज को
हां, बेहतर हो तुम, कहीं ज्यादा मुझ से
One of friend asked to write something for her daughter turned 21 today..I wish, I could be having a doughter, this is what, could come for her as well… कल तक तो, अठखेलियां करती थी,अपनी तुतलती बातों से, दिल जीत लेती थी,पता ही नहीं चला, कब बड़ी हो गई,बेटी से, कब मेरी सहेली बन गई, … Continue reading हां, बेहतर हो तुम, कहीं ज्यादा मुझ से
हमारा कोई नाता नहीं है
गुज़ारिश है तो कर रही थी वो,कि अपना लो मुझे,यूं ही कैसे, जिसे लाए हो,सात जन्मों का वादा करके,पल में अलग कर दिया,ना पूछा, ना बातें की,और दिल से जुदा कर दिया,बताओ, ऐसा कोई करता है क्या,मैं तो आईं थी, सब कुछ छोड़ कर,बस, तुम्हारे सहारे,लाड़ली थी उस घर की,बड़े अरमानों से किया था विदा,कहा … Continue reading हमारा कोई नाता नहीं है
अच्छा दोस्त समझती है
बुरा तो लगता है, जब वो मुझसे,मुंह फेरती हो, औरो से बात करती है,भूल गया था मैं, मुझे बस,अच्छा दोस्त समझती है,और मैंने तो इश्क़ किया है, उससे,और उसने ही तो बढ़ने दिया है इसे,अब फिर से, उसी मोड़ तक आने में,कुछ घड़ियां लगती है।। देव
सही और ग़लत
सही और ग़लत के बीच में,अटकी है सोच कहीं,शायद, भ्रम ही है,जो अक्सर गुमराह करता है, मोहब्बत और नफ़रत,बस, सुई भर की है दूरी,बस, दिल ही है,जो कुछ करने नहीं देता है, बेकरारी और लाचारी,दोनों कब है साथ में,बस, वक़्त ही तो है,जो साथ नहीं देता है।। देव
वक़्त कम क्यूं पड़ता है
किसी के लिए तन्हाई है,किसी का एंकात कहलाता है,घरों में बंद है लेकिन,दिल कहा टिक पाता है। कोई रुसवाई पीता है,कोई खुशहाल जीता है,घरों में बंद है लेकिन,जमाना पूरा दिखता है। कोई मगरूर है यहां पर,कोई महशूल है यहां पर,घरों में बंद है लेकिन,वक़्त कम क्यूं पड़ता है। देव
जो बोली ज्यादा लगता है, अब वही प्यार पाता है
अब कहा प्यार दिल से होता है,पहले, प्रश्नों का पर्चा, तैयार होता है,जात पात, तो मिटा दी है मगर,बैंक बैलेंस अहम किरदार होता है, कितना कमाते हो, क्या बचाया है,मां बाप साथ तो नहीं रहेंगे ना,सबसे ज्यादा, मुझे प्यार करोगे ना,गिफ्ट के टैग से, मोहब्बत को नापा जाता है।। मोलभाव किया जाता है,नीलाम किया जाता … Continue reading जो बोली ज्यादा लगता है, अब वही प्यार पाता है
ये लोकडाउन तो खुल जाने दो
रुको जरा, ये लोकडाउन तो खुल जाने दो,जरा, मेरे किचेन में, कुछ और ,सामान तो आने दो,थोड़ा, यारो को मेरे घर तो आने दो,दो चार पेग, मिल बैठ कर लगाने दो,फिर से वहीं महफ़िल,वही रंगत जम जाने दो,तब तक, बस तब तक ही सही,कुछ तुम बनाओ,कुछ हम बनाए,वक़्त कम कम ही रहा है,इंतेज़ार का,आओ, थोड़ा … Continue reading ये लोकडाउन तो खुल जाने दो
तुझे हद से ज्यादा, प्यार करूं
ख्वाब तेरे, सच मैं करू,तुझे हद से ज्यादा, प्यार करूं, तेरे सपने, मेरी मंजिले,तेरी मंजिलों को, मेरे रास्ते, कामैं चलता ही रहूं,मैं चलता ही रहूं,तेरे वास्ते,तेरे वास्ते, ख्वाब तेरे, सच मैं करू,तुझे हद से ज्यादा, प्यार करूं, तू मिली, जिंदगी मिली,तू नहीं, तो क्या जिंदगी,तेरा इंतजार, करता रहूंतेरा इंतज़ार, करता रहूंमेरे वास्तेमेरे वास्ते, ख्वाब तेरे, … Continue reading तुझे हद से ज्यादा, प्यार करूं
स्त्री पुरुष की समानता
कहने को तो बात, समानता की है,स्त्री पुरुष की समानता,और में भी हूं, यही मानता,मगर, फिर भी इतना अंतराल क्यूं है। करेक्टर गर खराब है,तो खराब है, क्या कहे,मगर पुरुष को करे बोल्ड,और स्त्री को बोल्ड कहना क्यूं है। जो बात, गलत है,उस बोलना ही क्यूं है,मगर, पुरुष को बोलना आम है,और स्त्री पे बवाल … Continue reading स्त्री पुरुष की समानता
सुबह, कितना सिखाती है
सुबह, कितना सिखाती है,ये हर रात के बाद आतीं है,ख्वाब, जो देखें थे रात में,बुनने का, जरिया बन जाती है, सुबह, हर रोज आती है,आशाएं, नई लाती है,सूरज की पहली किरण से पहले,जीवन में उजाला लातीं है, सुबह, मुझको बताती है,जो हुआ, वो कल था,आज, फिर मिला है तुझे,उठ, बड़, कर कुछ नया।। देव
उन दरखतो से पूछो,
उन दरखतो से पूछो,इंतेज़ार क्या होता है,हर साल, सावन के,इंतेज़ार में, महीनों गुजारते है,चिलचिलाती धूप में,कुछ सूख जाते है,लेकिन, खड़े रहते है,अपनी जगह, बसइक आस में,आज नहीं तो कल,फिर खिलेंगी,कोपुल मुझ पर,घनी बरसात में। देव
कागज की कश्ती ही तो
कागज की कश्ती ही तो,बन गई ये जिंदगी,जरा सी जोर की हवा भी,डूबने का सबब बन जाती है। तूफानों में क्या जाऊं,लेकर हाथ में, लौ दिए की,या तो बुझ ये जाएगी,या जला देगी, सब अरमा। देव
शायद, वो यारी कहीं छूट गई है
कभी होती थी, विशाल इमारतें यहां,अब तो खंडहर बन गई है,बड़ी बड़ी दीवारों को, जोड़ने वाली,वो छोटी छोटी दीवारों, कब की ढह गई है। अब कहा मिलती है, खुशबू,चमेली, मोगरे, गुलाब के फूलों की,ऑने कोने में उगे है झाड़,आंगन की जगह,इमली और बंबूल ने ले ली है, इतने बड़े दिल लेकर,अपनी शामे, साथ गुजरने वालो,क्या … Continue reading शायद, वो यारी कहीं छूट गई है
कुछ लम्हे, जिंदगी के
कुछ लम्हे, जिंदगी के,कुछ बाते, दिलो की,कुछ अनकहे किस्से,हम बांट लेते है, ना परवाह, जमाने की,ना फिकर, अपने कल की,थोड़ा सा हंस लेते हैथोड़ा हसा देते है गर , थोड़ा गुस्सा भी ही जाए,तो मना भी लेते हैहम दोस्त है, यू ही अपनीजिंदगी, मस्ती में गुजार देते है।। देव