उसके एक दीदार का असर,मुझे जड़ सा, कर गया था।।

आज यू ही, उसकी गली में,
जाना हुआ, और उसका,
सही वक़्त पर, देहलीज
से बाहर आना हुआ,
यूं ही नहीं, नजरें उसका
इंतेज़ार करती है, उसके,
गुजरने पर, यू ही नहीं,
सबकी निगाह रहती है,
और आज, आज तो जैसे,
रोशन यू ही नहीं, मोहल्ला है,
उसके कांधे से लटकता, साड़ी का,
पल्लू, उसके हाथो में घुमा है
बंधेज की नीली साड़ी में,
कुछ ज्यादा ही, जुर्म ढहा रही है,
जैसे बादलों में सासे, चमकती सी
बिजली चली आ रही है,
उसकी पलको का, उठ कर झुकना,
फिर ठहर कर उठना,
कहते हुए कुछ बात, पल में,
ठह ठाहा कर हसना,
साड़ी के पल्लू को, अंगुलियों में
उलझना, फिर सुलझाना,
एक एक कदम, बलखाकर
झट से आगे बढ़ जाना,

जाने, कब से चला जा रहा था,
या वही, स्तब्ध सा खड़ा था,
उसके एक दीदार का असर,
मुझे जड़ सा, कर गया था।।

देव

10 August 2020

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