मग्शूल हूं, मैं उसमें,वो तल्लीन सी, है मुझमें

इश्क़ है पर, मंजिल कहां,
बस रास्ते है, और रास्ते,
थामे दामन, यार का,
चलते चले, हम राह पे।

रुकते कभी, मुड़ते कभी,
क्या होगा कल, ना सोचा कभी,
देखे जमाना, अक्सर यहां
बेखौफ से, है हम यहां।

शाम क्या, और क्या सुबह,
रात गुजरती है बे वजह,
मग्शूल हूं, मैं उसमें,
वो तल्लीन सी, है मुझमें।

देव

06 August 2020

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